धनबाद का काला सोना, गिरिडीह का सेफ कॉरिडोर — करोड़ों की तस्करी का खुलासा !
दैनिक स्टेट डेस्क । झारखंड के कोयला नगरी धनबाद से निकलने वाला अवैध कोयला अब एक सुनियोजित और सुरक्षित रास्ते से बिहार तक पहुंच रहा है — और सूत्र बताते है इस पूरे खेल का केंद्र बना है गिरिडीह जिला। जी हां, गिरिडीह अब सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के अवैध कोयले को खपाने का “सेफ कॉरिडोर” बन चुका है। सूत्रों के अनुसार, धनबाद से निकला अवैध कोयला सबसे पहले गिरिडीह जिले के जमुआ में प्रवेश करता है। यहां से यह काफिला घोरथाम्बा और गावां क्षेत्रों को पार करते हुए सीधे बिहार के नवादा में दाखिल हो जाता है। इस पूरे मार्ग पर न कोई प्रभावी चेकपोस्ट है, न कोई जांच — बस खुलेआम कोयले से लदे ट्रकों का रात भर काफिला। खास बात यह है कि इस तस्करी को वैध दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेजों (डिस्को पेपर) का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन कागजातों के दम पर कोयले की गाड़ियां बिना किसी रोक-टोक के सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करती हैं। जमुआ से लेकर चतरो के रास्ते तक फैली यह तस्करी की लाइफलाइन स्थानीय लोगों में अब किसी राज से कम नहीं है। गिरिडीह का चतरो मार्ग इस अवैध धंधे में इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि तस्करी से जुड़े लोग खुलेआम इसे “कोयले की लाइफलाइन” कहते हैं।
जीएसटी बिल की आड़ में फैल रहा है अवैध कोयले का जाल
गिरिडीह के गावां और चतरो मार्ग से बिहार की सीमा में घुसते ही अवैध कोयले का यह काला कारोबार एक नई चालाकी अख्तियार कर लेता है। बिहार में प्रवेश करते ही तस्कर वैध जीएसटी ई-वे बिल तैयार कर लेते हैं, जिससे राज्य की सीमाओं के भीतर इन गाड़ियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। दरअसल, बिहार राज्य में कोयले की जांच के दौरान केवल जीएसटी बिल की मांग की जाती है — खनन की वैधता या मूल स्रोत की कोई जांच नहीं होती। इसी कानूनी खामी का फायदा उठाकर तस्कर धनबाद से चोरी का कोयला लाते हैं और बिहार में घुसते ही उसे “वैध” बना देते हैं। बिहार के नवादा और जमुई इस तस्करी के दो बड़े डिस्ट्रीब्यूशन पॉइंट बन गए हैं। यहां से यह कोयला आगे ईंट भट्ठों, मंडियों और छोटे उद्योगों में खपाया जाता है। जानकारों का कहना है कि इस धंधे से जुड़े नेटवर्क ने पूरे बिहार में अपनी जड़ें जमा ली हैं फिर यह कोयला विभिन्न मंडियों और उतर प्रदेश तक जाती है हालात यह है कि यह कारोबार अब सैकड़ों करोड़ रुपये सालाना का हो चुका है।
रात के अंधेरे में दौड़ती हैं ‘पासिंग’ का खेल —
धनबाद से बिहार तक अवैध कोयले की यह तस्करी अपने आप नहीं चलती — इसके पीछे एक सुव्यवस्थित चेन सिस्टम काम करता है, जिसे इस धंधे से जुड़े लोग “पासिंग” कहते हैं। सूत्रों के अनुसार, धनबाद से लेकर बिहार सीमा तक के हर क्षेत्र में इस नेटवर्क की पकड़ है। शाम ढलते ही जो सड़कें दिन में सुनसान नजर आती हैं, वे रात होते ही कोयले से लदे ट्रकों की कतार से भर जाती हैं। अहले सुबह तक यह काफिला बेरोक-टोक चलता रहता है। इस धंधे से जुड़े एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि प्रत्येक गाड़ी से एक तय “मीठी रकम” वसूली जाती है। यह रकम उस पूरे नेटवर्क में बंटती है जो धनबाद से बिहार सीमा तक हर चेकप्वाइंट पर इन गाड़ियों को “ग्रीन सिग्नल” देता है। यही “पासिंग सिस्टम” इस पूरे अवैध कारोबार की रीढ़ है।
⚠️ अगले अंक में पढ़िए — क्या है यह “पासिंग” सिस्टम? किस बैनर तले चल रहा है यह खेल? कौन हैं वो चेहरे जो इस पूरे नेटवर्क को संचालित करते हैं?

