स्वर्णरेखा का ‘बालू कॉरिडोर’ : 40 किलोमीटर में फैला करोड़ों का खेल, सड़क किनारे दिनदहाड़े चल रहा अवैध साम्राज्य
सरायकेला-खरसावां से जमशेदपुर तक स्वर्णरेखा नदी इन दिनों बालू माफियाओं के लिए सोने की खान बनी हुई है। मानीकुई घाट से हुरलुंग नदी घाट तक करीब 40 किलोमीटर के दायरे में एक दर्जन से अधिक घाटों पर खुलेआम अवैध बालू उठाव जारी है। सपड़ा, डोभो और गौरी गांव के घाट इस काले कारोबार के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक आधा दर्जन घाटों से रोजाना लगभग 600 ट्रैक्टर ट्रॉली बालू निकाली जा रही है। हैरानी की बात यह है कि पूरा खेल सड़क किनारे खुलेआम चल रहा है, लेकिन कार्रवाई नदारद है। स्थानीय स्तर पर पुलिस और खनन विभाग तक ‘फिक्स कमीशन’ पहुंचने की चर्चा है। बताया जा रहा है कि इस अवैध कारोबार से हर दिन करीब 20 लाख रुपये की काली कमाई हो रही है।
बिल्डरों की मांग पर चलता है अवैध खनन ! स्वर्णरेखा घाटों से तय होती है शहर के निर्माण बाजार की सप्लाई
जमशेदपुर और आसपास तेजी से बढ़ रहे निर्माण कार्यों ने स्वर्णरेखा नदी के घाटों को अवैध बालू कारोबार का बड़ा अड्डा बना दिया है। सूत्र बताते हैं कि आदित्यपुर, गम्हरिया और डोभो क्षेत्र के बड़े बिल्डर व ठेकेदार सीधे बालू माफियाओं के संपर्क में हैं। इन्हीं की मांग के अनुसार घाटों से बालू का उठाव बढ़ाया या घटाया जाता है। जब निर्माण परियोजनाएं तेज होती हैं, तब घाटों पर ट्रैक्टरों की कतारें लंबी हो जाती हैं। मानीकुई से हुरलुंग तक फैले घाटों पर दिन-रात मशीनें और ट्रैक्टर सक्रिय रहते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि नदी की धारा और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित है। सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में स्वर्णरेखा का सीना रोज छलनी किया जा रहा है?
स्वर्णरेखा के बालू खेल में कौन हैं असली ‘किंग’? किन अधिकारियों, ठेकेदारों और सफेदपोशों के इशारे पर चल रहा करोड़ों का नेटवर्क। दैनिक स्टेट करेगा बड़ा खुलासा—किस घाट से कितनी वसूली, किसे जाता है हिस्सा और कैसे रातोंरात बदल रही नदी की तस्वीर।

