चाईबासा से दुर्गापुर तक ‘काला आयरन रूट’! आखिर कौन है लौह अयस्क सिंडिकेट का असली मास्टरमाइंड? झारखंड के पश्चिम सिंहभूम से निकलने वाला लौह अयस्क अब सिर्फ खदानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह कथित तौर पर एक ऐसे संगठित नेटवर्क का हिस्सा बन चुका है, जिसकी जड़ें दुर्गापुर तक फैली बताई जा रही हैं। सूत्रों के मुताबिक हर दिन हजारों टन आयरन ओर गुप्त रास्तों से बाहर भेजा जा रहा है। इस पूरे खेल में ट्रांसपोर्ट, लोकल सप्लाई चैन और कथित सिंडिकेट की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। चर्चा इस बात की भी तेज है कि इस नेटवर्क को संचालित करने वाला एक “मास्टरमाइंड” है, जिसका नाम इलाके में लगातार उछल रहा है। राजनीतिक गलियारों से लेकर ग्रामीण चौपाल तक, हर जगह यही सवाल गूंज रहा है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर अवैध खनन और परिवहन बिना संरक्षण के कैसे संभव है? ग्रामीणों का आरोप है कि रात के अंधेरे में ट्रकों की आवाजाही लगातार जारी रहती है, लेकिन कार्रवाई नाममात्र की होती है। सूत्र बताते हैं कि पहले मजदूरों के जरिए छोटे स्तर पर डोको में खनिज निकाला जाता था, लेकिन अब यह कारोबार हाईटेक नेटवर्क में बदल चुका है। कथित तौर पर कई जिलों को जोड़कर सप्लाई चेन तैयार की गई है, जहां से माल दुर्गापुर के उद्योग क्षेत्रों तक पहुंचता है। अगर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हुई, तो कई प्रभावशाली नामों के सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
दिन में सन्नाटा, रात में ‘आयरन गेम’! जंगलों से निकलते ट्रक और खामोश सिस्टम पर उठते सवाल
चाईबासा के जंगल और पहाड़ी इलाकों में इन दिनों सिर्फ खनन नहीं, बल्कि एक बड़े “आयरन गेम” की चर्चा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि दिन में शांत दिखने वाले रास्ते रात होते ही भारी वाहनों की आवाजाही से गूंज उठते हैं। आरोप है कि अवैध रूप से निकाले गए लौह अयस्क को पहले छोटे-छोटे स्टॉक प्वाइंट पर जमा किया जाता है, फिर वहां से ट्रकों के जरिए बाहर भेज दिया जाता है।ग्रामीणों का कहना है कि इस अवैध खनन ने इलाके की पर्यावरणीय स्थिति बिगाड़ दी है। कई जगहों पर पहाड़ कट रहे हैं, जंगल प्रभावित हो रहे हैं और नदियों तक में मिट्टी भरने लगी है। इसके बावजूद कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी दिखाई दे रही है। राजनीतिक बयानबाजी भी अब तेज हो चुकी है और विपक्ष सरकार पर संरक्षण देने का आरोप लगा रहा है।
सूत्रों की मानें तो इस नेटवर्क में सिर्फ खनन ही नहीं, बल्कि परिवहन, स्टॉकिंग और बाहरी राज्यों तक सप्लाई का पूरा सिस्टम शामिल है। दावा यह भी किया जा रहा है कि रोजाना करीब 10 हजार टन तक लौह अयस्क की निकासी हो रही है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
देखिए अगले अंक में — आखिर कैसे चलता है पूरा नेटवर्क? कौन करता है फंडिंग, कैसे बदलते हैं रास्ते और किन रास्तों से दुर्गापुर तक पहुंचता है ‘काला आयरन’?

