पत्थर माफियाओं की करोड़ों की जालसाजी उजागर — 13 कारोबारियों पर पुलिस का शिकंजा
पाकुड़ (झारखंड), 8 जून 2026। झारखंड के पाकुड़ जिले में पत्थर खनन उद्योग से जुड़े एक सुनियोजित और बेहद शातिर फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ हुआ है। रांची मुख्यालय के सख्त निर्देश पर जिला खनन विभाग ने 1 जून को नगर थाने में कुल 13 पत्थर व्यवसायियों के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और दस्तावेज हेरफेर की प्राथमिकी कांड संख्या 123/2026 दर्ज कराई है। इन आरोपियों ने पर्यावरणीय मंजूरी हासिल करने के लिए सरकारी खनन कार्यालय की मूल रिपोर्ट में छेड़छाड़ की। देश के नियमों के अनुसार, 12.40 एकड़ से अधिक भूमि पर खनन के लिए केंद्र स्तरीय प्राधिकरण (बी1 श्रेणी) की कठिन पर्यावरणीय जांच से गुजरना अनिवार्य है। इससे बचने के लिए इन कारोबारियों ने खदान का वास्तविक क्षेत्रफल दस्तावेजों में जानबूझकर कम दर्शाया और ‘बी1’ श्रेणी को फर्जी तरीके से ‘बी2’ (राज्य स्तरीय) श्रेणी में बदलवा लिया — जिसकी जांच प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से सरल होती है। परिवर्तित दस्तावेजों को परिवेश पोर्टल पर अपलोड कर राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण से मंजूरी ले ली गई। इस तरह इन कारोबारियों ने न केवल सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण कानूनों की आड़ में करोड़ों रुपये का खनन भी किया। आरोपियों की सूची इस प्रकार है:
- एमएस स्टोन वर्क्स
- एमएस फोर स्टार स्टोन वर्क्स
- एमएस जीशान स्टोन वर्क
- एमएस मनोज स्टोन वर्क्स
- एमएस श्री गुरु स्टोन वर्क्स
- एमएस नव्या स्टोन वर्क्स
- राजीव रंजन पांडे
- एमएस नजामुद्दीन स्टोन वर्क्स
- एमएस अविनाश भगत स्टोन वर्क्स
- चार नए आवेदक (पाकुड़ एवं पश्चिम बंगाल के वीरभूम क्षेत्र से)
इनमें से 9 पुराने पट्टाधारियों के खनन पट्टे पहले ही रद्द किए जा चुके हैं और 4 नए आवेदक भी इस मामले में संलिप्त पाए गए हैं। जिला खनन पदाधिकारी राजेश कुमार की लिखित शिकायत पर नगर थाना प्रभारी अनिल कुमार गुप्ता ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
“यह कोई साधारण अनियमितता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र है जिसमें सरकारी दस्तावेजों के साथ खुली जालसाजी की गई है।” — जिला खनन विभाग, पाकुड़
सफेदपोशों की तलाश में जुटी पुलिस — डिजिटल ट्रेल और पोर्टल रिकॉर्ड से खुलेगा असली मास्टरमाइंड
पाकुड़ (झारखंड), 8 जून 2026। पत्थर खनन जालसाजी मामले में जहां 13 कारोबारियों पर प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है, वहीं नगर थाना पुलिस की असली चुनौती अब शुरू हुई है — उन सफेदपोशों को बेनकाब करना जिन्होंने इस सिंडिकेट को छाया में रहकर संचालित किया। जांच टीम इस समय तीन मोर्चों पर एकसाथ काम कर रही है।
जांच के तीन प्रमुख बिंदु:
- डिजिटल ट्रेल की पड़ताल — परिवेश पोर्टल पर दस्तावेज किस आईपी एड्रेस से और कब अपलोड किए गए, इसकी साइबर फॉरेंसिक जांच की जा रही है।
- फाइल मूवमेंट का विश्लेषण — जिला खनन कार्यालय की आंतरिक फाइलों में यह पता लगाया जा रहा है कि रिपोर्ट में बदलाव किस स्तर पर, किसके हस्ताक्षर से और कब हुआ।
- बंगाल कनेक्शन की जांच — मामले में पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के कारोबारियों की भी संलिप्तता सामने आई है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस अंतरराज्यीय सिंडिकेट की कड़ियां जोड़ने के लिए बंगाल पुलिस से भी समन्वय संभव है।
थाना प्रभारी अनिल कुमार गुप्ता ने बताया जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और जैसे-जैसे साक्ष्य मिलेंगे, आरोपियों की गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू होगी।
क्या अधिकारी भी घेरे में आएंगे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई सरकारी अधिकारी भी इस साजिश में शामिल था? क्योंकि सरकारी फाइल में बदलाव बिना आंतरिक पहुंच के संभव नहीं। यदि जांच में किसी अधिकारी की मिलीभगत साबित होती है, तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज हो सकता है।
भविष्य की कार्रवाई की संभावनाएं:
- संपत्ति कुर्की (Attachment of Assets)
- झारखंड खनन नीति के तहत जुर्माना
- केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED/CBI) का हस्तक्षेप — अगर मनी लॉन्ड्रिंग के साक्ष्य मिले
- पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का आकलन
खनन विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला झारखंड में खनन प्रशासन की पारदर्शिता पर गहरा सवाल उठाता है और इससे भविष्य में ऑनलाइन पोर्टल की डेटा ऑडिटिंग को और सख्त बनाने की जरूरत है।
महालेखाकार की कलम ने खोला पत्थर सिंडिकेट का काला खजाना — ऑडिट फाइलों से निकली करोड़ों की हेराफेरी
पाकुड़ (झारखंड), 8 जून 2026। पाकुड़ में वर्षों से फल-फूल रहे पत्थर खनन सिंडिकेट का पर्दाफाश किसी पुलिसिया छापे से नहीं, बल्कि महालेखाकार (Comptroller and Auditor General — CAG) कार्यालय की एक नियमित ऑडिट रिपोर्ट से हुआ। वित्तीय वर्ष 2022-23 की जांच के दौरान जब ऑडिट टीम ने खनन विभाग की फाइलें खंगालीं, तो उन्हें एक ऐसी विसंगति मिली जिसने पूरे तंत्र को हिलाकर रख दिया। जिला खनन कार्यालय द्वारा जारी ‘कंटिगुस रिपोर्ट’ (आसपास के क्षेत्रफल की रिपोर्ट) और सरकारी परिवेश पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेजों के बीच जमीन-आसमान का फर्क पाया गया। एक ही खदान के लिए मूल फाइल और पोर्टल डेटा में रकबे के आंकड़े अलग-अलग थे — और यह अंतर इतना बड़ा था कि इसे लिपिकीय भूल नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई हेराफेरी ही माना जा सकता था।
घोटाले का तकनीकी पहलू:
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के नियमों के तहत खनन क्षेत्रफल के आधार पर दो श्रेणियां तय है
| श्रेणी | रकबा | स्वीकृति प्राधिकरण | जांच का स्तर |
|---|---|---|---|
| बी1 | 12.40 एकड़ से अधिक | केंद्र स्तरीय (MoEFCC) | अत्यंत कठिन |
| बी2 | 12.40 एकड़ तक | राज्य स्तरीय (SEIAA) | तुलनात्मक रूप से सरल |
आरोपी कारोबारियों ने 12.40 एकड़ से अधिक रकबे वाली खदानों को जानबूझकर कम दर्शाया ताकि वे स्वतः ‘बी2’ श्रेणी में आ जाएं और कठिन केंद्रीय जांच से बचा जा सके। बदले हुए आंकड़ों के आधार पर राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) ने बिना शंका के स्वीकृति जारी कर दी। ऑडिट टीम ने इस खुलासे के बाद विस्तृत जांच की सिफारिश की। इसके आधार पर रांची मुख्यालय हरकत में आया और जिला प्रशासन को तत्काल कार्रवाई के आदेश दिए गए। बाद में सभी संबंधित पर्यावरणीय स्वीकृतियां वापस ले ली गईं और पट्टे भी निरस्त कर दिए गए।खनन क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इस तरह की हेराफेरी अकेले एक कारोबारी के बूते संभव नहीं — इसके पीछे विभाग के भीतर के कुछ दागी अधिकारियों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता।

