धर्मेंद्र पटेल । दैनिक स्टेट
झारखंड के सिरका कोयला क्षेत्र से ‘शोले’ के रामगढ़ तक: महानायक अमिताभ बच्चन के संघर्ष की अनसुनी कहानी
रामगढ़ की सिरका कोलियरी, जहां कोयले की धूल में पल रहा था एक सपना
आज करोड़ों दिलों पर राज करने वाले अमिताभ बच्चन के संघर्ष का एक ऐसा अध्याय भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। फिल्मों में आने से पहले युवा अमिताभ रोजगार की तलाश में तत्कालीन बिहार (वर्तमान झारखंड) के रामगढ़ जिले की सिरका कोलियरी पहुंचे थे। चर्चित विवरणों के अनुसार, उन्हें मेसर्स बर्ड एंड कंपनी में अवसर मिला और वहां से सिरका कोलियरी भेजा गया। बताया जाता है कि तत्कालीन कोलियरी मैनेजर सी.एस. झा ने उन्हें काम सिखाया, रहने-खाने की व्यवस्था कराई और कोयला उद्योग की बारीकियों से परिचित कराया। सिरका में बिताए वे शुरुआती दिन उनके जीवन के संघर्षपूर्ण लेकिन महत्वपूर्ण पड़ाव माने जाते हैं। सी.एस. झा अपने परिचितों के बीच अक्सर उस लंबे, शांत और संकोची युवक की चर्चा किया करते थे, जिसे दुनिया बाद में “सदी का महानायक” कहने लगी।
खदान से मुंबई तक: जब किस्मत ने बदली जिंदगी की दिशा
करीब सात-आठ महीने तक अमिताभ बच्चन ने कोलियरी से जुड़े कार्यों को समझा, लेकिन उनका मन इस नौकरी में पूरी तरह नहीं रम पाया। वरिष्ठ अधिकारियों को भी महसूस हुआ कि इस युवक की मंजिल खदान या दफ्तर नहीं, बल्कि कोई बड़ा मंच है। इसके बाद वे कोलकाता लौटे, वहां कुछ समय नौकरी की और फिर 1968-69 के आसपास सपनों की नगरी मुंबई पहुंच गए। वर्ष 1969 में फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। शुरुआती कई फिल्में सफल नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने संघर्ष नहीं छोड़ा। लगातार मेहनत और आत्मविश्वास ने आखिरकार उनकी किस्मत बदल दी।
‘जंजीर’ ने बनाया स्टार, ‘शोले’ के रामगढ़ ने बनाया अमर महानायक
साल 1973 में रिलीज हुई ‘जंजीर’ अमिताभ बच्चन के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इसी फिल्म ने उन्हें “एंग्री यंग मैन” की पहचान दिलाई और बॉलीवुड में उनका मजबूत स्थान बना दिया। लेकिन असली इतिहास 1975 में रिलीज हुई ‘शोले’ ने रचा। संयोग देखिए—जिस अभिनेता ने अपने संघर्ष के दिनों में झारखंड के रामगढ़ में समय बिताया, उसी अभिनेता को फिल्म ‘शोले’ के काल्पनिक रामगढ़ ने हमेशा के लिए अमर कर दिया। एक रामगढ़ ने उन्हें जीवन का अनुभव दिया, जबकि दूसरे रामगढ़ ने उन्हें भारतीय सिनेमा का महानायक बना दिया। भारतीय फिल्म इतिहास में ऐसा संयोग बेहद दुर्लभ माना जाता है।
‘काला पत्थर’ में दिखी खदान की सच्चाई, रामगढ़ आज भी करता है गर्व
1979 में आई फिल्म ‘काला पत्थर’, जो चासनाला खदान दुर्घटना से प्रेरित मानी जाती है, उसमें अमिताभ बच्चन का अभिनय आज भी याद किया जाता है। माना जाता है कि कोयला क्षेत्र में बिताए शुरुआती अनुभवों ने उन्हें खदानों की कठिन जिंदगी, मजदूरों के संघर्ष और जोखिम को करीब से समझने का अवसर दिया था। यही कारण है कि उस किरदार में एक अलग वास्तविकता दिखाई देती है। आज रामगढ़ के लोगों के लिए यह सिर्फ एक पुरानी कहानी नहीं, बल्कि गर्व की विरासत है कि इसी धरती ने संघर्ष के दिनों में उस युवक को सहारा दिया, जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा का “शहंशाह” और “सदी का महानायक” बना।
क्या आपको पता था?
– फिल्मों में आने से पहले अमिताभ बच्चन का जुड़ाव कोयला उद्योग से रहा था।
– झारखंड के रामगढ़ की सिरका कोलियरी उनके संघर्ष का अहम पड़ाव मानी जाती है।
– ‘जंजीर’ ने उन्हें बॉलीवुड का नया सुपरस्टार बनाया।
– ‘शोले’ के काल्पनिक रामगढ़ ने उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया।
– संघर्ष से शिखर तक का उनका सफर आज भी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है।
अब आपकी बारी…
क्या आपको पहले से पता था कि महानायक अमिताभ बच्चन के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय झारखंड के रामगढ़ से जुड़ा रहा है?
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