📰 विस्थापन नीति का खेल: आशियाना खाली, सपने बिखरे, हाथ लगा सिर्फ धुआं
रामगढ़ जिले के बेस्ट बोकारो में खनन कंपनी की विस्थापन और पुनर्वास नीति को लेकर पीड़ित ग्रामीणों के बीच गहरा आक्रोश है। आरोप है कि इस नीति में कई ऐसे “झोल” हैं, जिनकी वजह से वर्षों से बसी बस्तियां तो उजड़ ही जाती हैं, साथ ही मुआवजे की रकम और प्रक्रिया में भी पीड़ित को हर कदम पर धोखा मिलता है। पेश है पूरी रिपोर्ट,
🏚️ जब ‘नापी’ के नाम पर छलनी हो जाता है हक
एक खनन कंपनी जब किसी बस्ती को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू करती है, तो सबसे पहले क्षेत्रफल की नापी शुरू होती है। लेकिन यह नापी जिस तरह से की जाती है, वह पीड़ितों के लिए किसी पहेली से कम नहीं है। पीड़ित ग्रामीणों के अनुसार, कंपनी के ठेकेदार और कर्मचारी जब नापी करने आते हैं, तो वे किसी एक मकान का कुल क्षेत्रफल एक बार में नहीं नापते। बल्कि वे हर कमरे, हर बाथरूम, हर रसोई, हर बरामदे और हर बेडरूम की अलग-अलग नापी करते हैं। यानी एक पक्के मकान को टुकड़ों-टुकड़ों में नापा जाता है। यहां तक कि खाली पड़ी ज़मीन और दुकानों की भी यही दुर्गति है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस नापी का कोई लिखित प्रमाण पीड़ित को नहीं दिया जाता। न ही कोई स्लिप, न ही कोई रसीद, न ही कोई हस्ताक्षरित दस्तावेज। पीड़ित बेचारा हाथ में सिर्फ उंगलियां लेकर रह जाता है कि उसका कुल रकबा भविष्य में दावा करने के लिए उसके पास कोई सबूत नहीं है। जब मुआवजा तय होने का समय आता है, तो पीड़ित केवल यह देख सकता है कि “बताई गई नापी” और “असल नापी” में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। यह नापी की प्रक्रिया ही एक ऐसी गुत्थी है, जिसमें उलझकर सबसे पहले पीड़ित का ही हक खो जाता है।
💬 बढ़िया ऑफर, मीठी बातें, और फिर उतार-चढ़ाव का झूला
नापी के बाद शुरू होता है असली खेल — बैठकों का दौर। शुरुआती दौर में कंपनी के प्रतिनिधि गाँव-गाँव जाकर प्रभावित परिवारों से मिलते हैं। इन बैठकों में उन्हें मुआवजे की इतनी बड़ी-बड़ी रकम का लालच दिया जाता है कि पीड़ित परिवार मान जाए। “आपको इतना मिलेगा, इतना मिलेगा” — सुनकर ग्रामीण अपने सपने बुनने लगता है। लेकिन यह सब होता है सिर्फ मौखिक। कोई लिखित आश्वासन नहीं, कोई एमओयू नहीं, कोई स्टाम्प पेपर नहीं। पीड़ित परिवार मीठी-मीठी बातों और बढ़े-चढ़े आंकड़ों के भरोसे अपना मकान खाली कर देता है।असली उतार-चढ़ाव तब शुरू होते हैं जब दूसरी, तीसरी बैठक बुलाई जाती है। अब रकम में अचानक गिरावट आ जाती है। पीड़ित हैरान रह जाता है। वह मौखिक विरोध तो कर सकता है, लेकिन हाथ में कोई कागज नहीं कि “देखिए पहली बैठक में आपने इतना बोला था!” हर नई बैठक में मुआवजा पिघलता जाता है जैसे गर्मी में बर्फ। कंपनी द्वारा दिया गया शुरुआती “शानदार ऑफर” धीरे-धीरे लुका-छिपी खेलने लगता है और पीड़ित अपने बिखरते सपनों को सहेजते हुए बैठक से उठता है — हाथ में कुछ नहीं, सिर्फ एक और मौखिक वादा।
📄 क्षतिपूर्ति बॉन्ड — जहां पीड़ित खुद लिखे अपने हक की मौत
बैठकों का दौर खत्म होने के बाद आता है सबसे अहम चरण — क्षतिपूर्ति बॉन्ड भराई। यह वह दस्तावेज है जिसमें मुआवजे का अंतिम निर्धारण होता है। लेकिन इसमें भी पीड़ित के लिए कोई राहत नहीं है, बल्कि उल्टे यहाँ तो पीड़ित खुद अपने हाथों अपनी ही फाइल पर मोहर लगाने को मजबूर हो जाता है। सबसे बड़ा मज़ेदार-दुखद पहलू यह कि बॉन्ड की राशि का भुगतान भी पीड़ित खुद करता है, लेकिन वह कंपनी के फॉर्मेट में बंधा होता है। इस बॉन्ड में परिवार के सभी सदस्यों का पूरा विवरण भरना होता है, जिसमें यह भी बताना होता है कि वे अब कहाँ रह रहे हैं। अब इसी बॉन्ड में एक कॉलम होता है — क्षेत्रफल (रकबा) का। यह कॉलम या तो कंपनी के कर्मी भरते हैं, या पीड़ित को उन्हीं के बताए अनुसार भरना होता है। और यहाँ फिर से वही किस्सा दोहराया जाता है — पीड़ित देखता है कि उसकी कुल नापी में अचानक भारी कमी आ चुकी है! चूँकि उसके पास शुरुआती नापी का कोई लिखित दस्तावेज नहीं था, वह इस कमी को साबित नहीं कर सकता। मकान टूट चुका है, पुरानी जगह पर कोयला निकलना शुरू हो चुका है, वापसी की कोई गुंजाइश नहीं। ऐसे में पीड़ित के पास एक ही रास्ता बचता है — बॉन्ड पर हस्ताक्षर और संतोष।
😞 ‘वापसी’ का रास्ता बंद, मुआवजे की चक्की में बरसों पिसते लोग
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सबसे दर्दनाक मोड़ तब आता है जब पीड़ित को पता चलता है कि मुआवजा मिलने में सालों लग सकते हैं — और कई मामलों में तो अब तक नहीं मिला है। पीड़ितों का कहना है कि मकान खाली करवाए जाने के बाद कई महीने, बल्कि कई साल बीत जाते हैं और मुआवजे की राशि नहीं आती। हर बार कंपनी की ओर से नया आश्वासन, नई तारीख, नया बहाना। पीड़ित परिवार पहले ही अपना आशियाना छोड़ चुका होता है, नई जगह पर किराए या अस्थायी ठिकाने पर रह रहा होता है, और मुआवजे के लिए कंपनी के चक्कर काटता रहता है। एक पीड़ित ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “कंपनी वाले कहते हैं — चेक आ रहा है, चेक आ रहा है… हम तो उस चेक और आश्वासन की चक्की में पिसते ही रह गए। कोयला तो ज़मीन के नीचे से निकल गया, हमारी ज़िंदगी का कोयला भी जल गया।” विस्थापन और पुनर्वास नीति में नापी, मौखिक आश्वासन, क्षतिपूर्ति बॉन्ड और भुगतान — हर स्तर पर पीड़ित के हाथ कुछ नहीं आता। आज भी रामगढ़ जिले में कई ऐसे परिवार हैं जो बरसों बाद भी पूरे मुआवजे का इंतज़ार कर रहे हैं, और अब उनके पास न तो अपना पुराना मकान है और न ही कोई ठोस दस्तावेज जिससे वह अपना हक जमा सकें।
👉 “उजड़ा आशियाना, अधूरा मुआवजा और जवाब तलाशते लोग”
पूरी पड़ताल, सिर्फ दैनिक स्टेट के अगले अंक में… धर्मेंद्र पटेल

