गिरिडीह मॉडल: बैलगाड़ी के सहारे चल रहा करोड़ों का अवैध कोयला कारोबार
गिरिडीह (दैनिक स्टेट डेस्क):यदि कोयला तस्करी में ‘स्मार्टनेस’ का कोई पैमाना होता, तो गिरिडीह के तस्कर उसका मानक ही बन जाते। क्योंकि वे वो कला जानते हैं जो न तो धनबाड़ी जानते हैं, न राजस्थान के तस्कर। वो कला है — ऐसा अपराध करो जिसमें अपराधी पकड़ा ही न जाए। गिरिडीह के तस्करों ने इस कला को सिद्ध कर दिया है। कबरीबाद, बनियाडीह और पचंबा की खदानों से निकाला जाने वाला कोयला इतने व्यवस्थित तरीके से तस्करी किया जाता है कि पुलिस के पास सिर्फ खाली बैलगाड़ी और बैल रह जाते हैं। मालिक? वो सवाल है जो सदा के लिए अनुत्तरित रह जाता है। इसीलिए गिरिडीह के तस्कर न सिर्फ कोयला चोरी करते हैं, बल्कि कानून के पूरे ढाँचे को चोरी करते हैं।
बैलगाड़ी — क्यों चुना गया यह ‘नीरव हथियार’?
गिरिडीह की जड़ों से समझें: कोयला तस्करी के लिए बैलगाड़ी का चुनाव कोई अचानक नहीं, बल्कि एक गणना किया हुआ फैसला है। आइए समझते हैं कि आखिर सदियों पुरानी इस गाड़ी ने तस्करों का विश्वास क्यों हासिल किया है —
1. शोर नहीं, सन्नाटा है: एक ट्रक की आवाज़ दूर से ही पुलिस को सतर्क कर देती है। एक ट्रैक्टर की गड़गड़ाहट एक किलोमीटर दूर तक सुनी जा सकती है। लेकिन बैलगाड़ी? वह तो रात के सन्नाटे में एक कविता की तरह चुपचाप आगे बढ़ती जाती है। पुलिस चौकी के पास से भी गुज़र सकती है, और कोई नहीं जानेगा कि 400 किलो कोयला अभी-अभी निकल गया।
2. संकरे रास्ते, बड़ी गाड़ियों का कब्रिस्तान: गिरिडीह की खदानों के इर्द-गिर्द घने जंगल, नदी-नाले और एकदम संकरे पगडंडीनुमा रास्ते हैं। एक जीप भी इन रास्तों पर फँस जाएगी, लेकिन बैलगाड़ी? वह तो ऐसे रास्तों के लिए ही बनी है। यह जंगल की भाषा बोलती है।
3. बेजुबान गवाह, कोई सबूत नहीं: यदि कोई बैलगाड़ी पकड़ी जाए, तो क्या होगा? पुलिस बैलों पर मुकदमा नहीं चला सकती। उनसे पूछताछ नहीं कर सकती। गाड़ी को कहीं रख सकते हैं, लेकिन मालिक का नाम कहाँ से आएगा? वह तो रजिस्ट्रेशन पेपर में होता है, और बैलगाड़ी के पास तो कोई पेपर होता ही नहीं। यह ‘नो डॉक्यूमेंट, नो क्राइम’ का परफेक्ट फॉर्मूला है।
4. पकड़े जाने का शून्य जोखिम: यदि तस्कर को पुलिस का हुजूम दिख जाए, तो सिर्फ बैलगाड़ी और कोयला छोड़ दो, और खुद जंगल में गायब हो जाओ। ट्रक चला नहीं सकते — पेट्रोल खत्म हो जाएगा, ड्राइवर गिरफ्तार हो जाएगा। लेकिन बैलगाड़ी? वह तो बेजान है। उसके मालिक को खोज पाना रेत में सुई ढूँढने जैसा है।
कानून की खामियों का शोषण
सूत्र बताते है को गिरिडीह जिले जहाँ अवैध कोयला कारोबार की शिकायतें आती हैं, लेकिन सवाल वही खड़ा हो जाता है सवाल 1 – मालिक कौन है? बैलगाड़ी पर कोई नाम नहीं लिखा। कोई नंबर प्लेट नहीं। परिवहन विभाग के पास कोई रिकॉर्ड नहीं। तो अब कौन गिरफ्तार करेंगे? जब तक किसी को हाथ पकड़ते हुए न पकड़ोगे (रंगे हाथों), तब तक प्राथमिकी में नाम ही नहीं डाल सकते।
सवाल 2 – बैलों का क्या? बैल बेज़ुबान जानवर हैं। उन पर मुकदमा चला सकते हो? नहीं। उन्हें गौशाला भेजना पड़ता है।
साइलेंट ऑपरेशन’ — रात का अंधेरा और कोयले का सफर
सूत्र बताते है कि गिरिडीह से बिहार तक: एक लूप का डिजाइन: रात के 9 बजे, जब पूरा गिरिडीह सो जाता है, तब कबरीबाद की खदानों से एक अलग ही ‘नगर जीवन’ शुरू हो जाता है। बैलगाड़ियों के भूत कोयला लाद-लादकर अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं।
पचंबा का बड़ा रूट: सूत्र बताते है कि पचंबा थाना क्षेत्र से शुरू होने वाली यात्रा ताराटांड़, बड़ियाबाद, नईटांड़, फुफंदी, पारडीह होते हुए बिहार की सीमा तक पहुँचती है। हर रात दो दर्जन से अधिक बैलगाड़ियाँ इसी रूट से गुज़रती हैं। ये बैलगाड़ियाँ सुबह 3-4 बजे तक बिहार के अलग-अलग ठिकानों पर कोयला उतार आती हैं।
बेंगाबाद की रात की सराय: सूत्र बताते है कि बेंगाबाद में रात भर का कारोबार ही निराला है। यहाँ बाइकें, बैलगाड़ियाँ और छोटे-मोटे वाहन — सभी एक-दूसरे से कोयला ‘हस्तांतरित’ करते हैं। कहीं से कोयला आता है, कहीं को जाता है। यह एक बिस्तर है, जहाँ देवघर और बिहार के ‘आधार’ सीधे जुड़े हैं।
तिसरी का ‘ट्रक कारवाँ’: सूत्र यह भी बताते है कि रात 11 बजे से अलसुबह 4 बजे तक तिसरी की सड़कें 20-20 ट्रकों के जत्थे का मंच बन जाती हैं। ये ट्रक इतने तेज़ चलते हैं कि मॉर्निंग वॉक करने वालों के लिए सड़क ही नहीं रह जाती। बाइकों पर भी कोयला लदा जाता है — एक बाइक पर 50 किलो तक। ये बाइकें, ये बैलगाड़ियाँ, ये ट्रक — सभी मिलकर एक ‘अंधेरे का नेटवर्क’ बनाते हैं, जहाँ कोयला एक तरल पदार्थ की तरह बहता है।
स्मार्ट तस्कर’ का एक अंधेरा खेल
गिरिडीह के तस्कर वाकई ‘स्मार्ट’ हैं — लेकिन उनकी स्मार्टनेस का मतलब है कानून को चकमा देना, बेजुबान जानवरों को आश्रय देना, और गाँव के बच्चों को रोज़ की खतरे में डालना। बैलगाड़ी ने सदियों से गाँव की अर्थव्यवस्था को बचाया था, लेकिन आज वही गाड़ी गाँव के ही भविष्य को लूट रही है। सवाल यह नहीं है कि गिरिडीह के तस्कर कितने स्मार्ट हैं — सवाल यह है कि हमारा सिस्टम इस स्मार्टनेस को कैसे रोक पाएगी ?

