मजहब की दीवार भी नहीं तोड़ पाई प्यार का रिश्ता, धनबाद के विपुल ने लीं राहत प्रवीण के साथ सात फेरे
दैनिक स्टेट डेस्क। धर्म और जाति की ऊँची दीवारें जिस प्रेम को रोक नहीं पाईं, वह आखिरकार सात फेरों में ढल गया। निरसा के आंखद्वारा में संपन्न यह अंतरधार्मिक विवाह न केवल इलाके में चर्चा का केंद्र है, बल्कि यह एक ऐसी प्रेम कहानी है जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा दे सकती है। झारखंड के विपुल मंडल और बिहार की राहत प्रवीण की यह कहानी उस सच को फिर साबित करती है — “प्यार किसी मजहब का मोहताज नहीं होता।”
स्क्रीन पर मिली नजरें, दिल में उतरा प्यार — डनोखी प्रेम कहानी
आज के दौर में जहाँ स्मार्टफोन रिश्तों को तोड़ने का जरिया बन रहा है, वहीं विपुल और राहत की कहानी इसका उलट उदाहरण है। वर्ष 2023 में इंटरनेट के जरिए दोनों की पहली मुलाकात हुई। सोशल मीडिया पर शुरू हुई एक साधारण-सी बातचीत धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदली, और दोस्ती ने कब प्यार की शक्ल ले ली — दोनों को खुद भी एहसास नहीं हुआ।बिहार के नवादा जिले की रहने वाली राहत प्रवीण और झारखंड के निरसा (धनबाद) के विपुल मंडल — दो अलग-अलग धर्म, दो अलग-अलग राज्य, दो अलग-अलग परिवेश। फिर भी प्यार ने सारी सीमाएँ पार कर लीं।
💬 यह कोई नई बात नहीं। आँकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लाखों जोड़े सोशल मीडिया के जरिए मिलते हैं। ‘मैचिंग इंडिया’ सर्वे (2023) के अनुसार देश में 38% शहरी युवा अपना जीवनसाथी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ढूँढते हैं। विपुल और राहत इसी डिजिटल क्रांति की एक जीती-जागती मिसाल बन गए।
करीब दो वर्षों की लंबी दोस्ती और प्रेम के बाद दोनों ने जीवनभर साथ निभाने का फैसला किया। न धर्म आड़े आया, न जाति, न राज्य की सीमा।
वेदमंत्रों की गूँज में गूँजा ‘कबूल है’ का भाव — सनातन रस्मों से सजा अनोखा विवाह
यह विवाह समारोह अपने आप में एक ऐतिहासिक पल था। निरसा के आंखद्वारा में आयोजित इस शादी में सब कुछ पूरी तरह सनातन परंपरा के अनुसार संपन्न हुआ।
विवाह की रस्में कुछ इस प्रकार रहीं —
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- 🌸 वरमाला — वैदिक मंत्रोच्चार के बीच राहत और विपुल ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई
- 🔥 सप्तपदी (सात फेरे) — पवित्र अग्नि के सामने सात वचनों के साथ जन्म-जन्म का बंधन बाँधा
- 🔴 सिंदूरदान — विपुल ने राहत की माँग में सिंदूर भरकर उन्हें अपनी जीवनसंगिनी स्वीकार किया
- 🌺 फूलों की बारिश — उपस्थित ग्रामीणों ने नवदंपति का भव्य स्वागत किया
💡 एक रोचक तथ्य: भारतीय कानून के तहत स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 अंतरधार्मिक विवाह को पूरी तरह वैध मानता है। इसके तहत किसी भी धर्म को अपनाए बिना शादी की जा सकती है। लेकिन राहत ने खुद की इच्छा से हिंदू रीति-रिवाज अपनाए — यही इस विवाह को और भी खास बनाता है।ी ने भी कहा कि उन्होंने पहली बार ऐसे विवाह में शिरकत की जहाँ दोनों के परिवार इतने सहजता से एक साथ बैठे और संस्कारों में भाग लिया।
यह पहला नहीं, देश में पहले भी टूटी हैं धर्म की दीवारें — इतिहास के पन्नों से कुछ मिसालें
विपुल और राहत की कहानी भले ही निरसा में नई हो, लेकिन भारत का इतिहास ऐसे प्रेम की मिसालों से भरा पड़ा है जहाँ धर्म की दीवारें प्यार के आगे टिक नहीं पाईं।
- 🎬 बॉलीवुड में भी यही कहानी — शाहरुख खान (मुस्लिम) और गौरी चड्ढा (हिंदू) की शादी 1991 में हुई और आज भी वे प्रेम और सम्मान की मिसाल हैं। उन्होंने कभी धर्म को अपने बीच नहीं आने दिया।
- 🏏 क्रिकेट जगत से भी उदाहरण — पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान ने भी अंतरधार्मिक विवाह किया, जिसे समाज ने धीरे-धीरे स्वीकार किया।
- 🌍 केरल का उदाहरण — केरल हाई कोर्ट ने 2022 में एक अंतरधार्मिक जोड़े के विवाह को बरकरार रखते हुए कहा था — “संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है।”
- 🏙️ दिल्ली का चर्चित मामला — 2023 में दिल्ली के एक जोड़े की अंतरधार्मिक शादी को सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा देते हुए कहा कि “प्रेम और विवाह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।”
इन सब उदाहरणों से साफ होता है कि विपुल और राहत का यह कदम समाज में बड़े बदलाव की एक छोटी-सी लेकिन मजबूत कड़ी है।
“प्यार और इज्जत से जिएँगे” — नवदंपति का संदेश, समाज ने थामा हाथ
शादी के बाद मीडिया से बातचीत में राहत प्रवीण ने बिना किसी झिझक के कहा —
“मैंने यह फैसला किसी के दबाव में नहीं लिया। विपुल से प्यार करती हूँ और अपनी मर्जी से हिंदू रीति-रिवाज से शादी की है। मुझे गर्व है इस फैसले पर।”
वहीं विपुल मंडल ने भी भावुक होते हुए कहा —
“राहत ने धर्म से ऊपर उठकर मुझे चुना। अब मेरी जिम्मेदारी है कि मैं उनका भरोसा कभी न तोड़ूँ।”
स्थानीय बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों ने इस विवाह को सराहा और इसे सामाजिक सौहार्द और साम्प्रदायिक सद्भाव की एक खूबसूरत मिसाल करार दिया। उनका कहना था कि जब दो दिल प्यार में मिलते हैं तो धर्म की दीवार बेमानी हो जाती है।
📊 एक नजर आँकड़ों पर: ‘प्यू रिसर्च सेंटर’ की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 2.21% विवाह अंतरधार्मिक होते हैं। यही वजह है कि विपुल और राहतर्चा और प्रेरणा का कारण बनते हैं।

