रामगढ़ दवा टेंडर पर बड़ा सवाल!
40 गुना तक दरों का अंतर, कांग्रेस नेता ने मांगी हाईलेवल जांच और वित्तीय ऑडिट
रामगढ़। सिविल सर्जन कार्यालय, रामगढ़ द्वारा दवाइयों एवं मेडिकल सामग्री की खरीद के लिए किए गए टेंडर को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव राजकुमार यादव ने उपायुक्त, रामगढ़ को लिखित शिकायत देकर टेंडर की दरों में प्रथमदृष्टया असामान्य अंतर, संभावित टेंडर मैनेजिंग/मिलीभगत और सरकारी खजाने पर संभावित अतिरिक्त वित्तीय भार की उच्चस्तरीय, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की है।
राजकुमार यादव का दावा है कि उपलब्ध दस्तावेजों और तुलनात्मक Excel विवरण के अध्ययन में रामगढ़ के वर्तमान टेंडर और रांची टेंडर 2026 की दरों के बीच कई दवाइयों में भारी अंतर दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल 333 दवाइयों की दरों की तुलना की गई है। इनमें 253 दवाइयों की दर 2 गुना से अधिक, 166 दवाइयों की दर 3 गुना से अधिक और 81 दवाइयों की दर 5 गुना से अधिक बताई गई है। वहीं 18 दवाइयों में 10 गुना से अधिक का अंतर दर्ज होने का दावा किया गया है।
सबसे चौंकाने वाला उदाहरण Silver Sulphadiazine Cream 1% 500 gm का बताया गया है। शिकायत के अनुसार रामगढ़ में इसकी दर ₹725.95, जबकि रांची की तुलनात्मक दर ₹18 है। यानी दोनों दरों के बीच लगभग 40 गुना का अंतर दिखाई देता है।
इसी तरह Olanzapine 5 mg में करीब 25 गुना, Co-trimoxazole Oral Liquid में करीब 24 गुना तथा Zoledronic Acid Injection 4 mg में करीब 23 गुना अंतर बताया गया है। Haloperidol, Glimepiride, Clonazepam, Ondansetron, Enalapril और Risperidone समेत कई अन्य दवाइयों की दरों में भी कई गुना अंतर का दावा किया गया है।
हालांकि, केवल दरों में अंतर किसी व्यक्ति या कंपनी को दोषी साबित नहीं करता। यही वजह है कि शिकायतकर्ता ने स्वतंत्र जांच और वित्तीय ऑडिट की मांग की है, ताकि वास्तविक स्थिति दस्तावेजों और खरीद रिकॉर्ड के आधार पर सामने आ सके।
पुराने टेंडर ने भी बढ़ाई टेंशन!
मौजूदा दर बनाम पुरानी दर में भी बड़ा अंतर, 32 दवाइयों में तीन गुना से ज्यादा का दावा
दवा टेंडर को लेकर उठे सवाल सिर्फ रांची की दरों तक सीमित नहीं हैं। शिकायतकर्ता ने वर्तमान रामगढ़ टेंडर की तुलना पुराने रामगढ़ टेंडर से भी कराने की मांग की है।
उपलब्ध तुलनात्मक आंकड़ों के अनुसार 154 दवाइयों की वर्तमान और पुरानी दर दोनों उपलब्ध हैं। इनमें 61 दवाइयों की वर्तमान दर पुरानी दर से 2 गुना से अधिक तथा 32 दवाइयों की दर 3 गुना से अधिक दिखाई देती है।
इसका एक उदाहरण Glimepiride Tablet 2 mg बताया गया है। शिकायत के अनुसार वर्तमान रामगढ़ टेंडर में इसकी दर ₹2.50 है, जबकि पुराने टेंडर में यह दर ₹0.30 थी। यानी वर्तमान दर पुराने टेंडर की तुलना में लगभग 8 गुना से अधिक बताई गई है।
राजकुमार यादव का कहना है कि यदि एक ही जिले में पहले किसी दवा की खरीद काफी कम दर पर हुई थी और बाद के टेंडर में उसी या समान specification की दर कई गुना बढ़ी है, तो इसकी वजह जानना जरूरी है।
इसके लिए उन्होंने प्रत्येक दवा के मामले में specification, strength, dosage form, pack size, brand/generic स्थिति, GST, परिवहन एवं अन्य लागत को समान आधार पर रखते हुए वास्तविक तुलना कराने की मांग की है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रांची में दवा कितने में खरीदी गई, बल्कि यह भी है कि रामगढ़ में पुरानी खरीद की तुलना में नई दर क्यों और कितनी बढ़ी?
टेंडर में कौन कितना स्वतंत्र?
बोली लगाने वाली कंपनियों के दस्तावेज, L1-L2-L3 और संभावित मिलीभगत की जांच की मांग
मामले का दूसरा अहम पहलू टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता है। शिकायत में टेंडर में भाग लेने वाली कंपनियों के दस्तावेजों और उनकी आपसी स्वतंत्रता की जांच की मांग की गई है।
उपलब्ध सामग्री में अंजनी मेडिकल एंड सर्जिकल्स, एस. अभय इंटरप्राइजेज तथा वीरेंद्र कुमार सिंह/पाम पैरामेडिकल आदि के नाम सामने आने की बात कही गई है।
राजकुमार यादव ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी कंपनी अथवा व्यक्ति को सिर्फ दरों में अंतर के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन यदि समान दवाइयों की दरों में असामान्य अंतर सामने आता है, तो यह जांच करना जरूरी है कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र और प्रतिस्पर्धी थी या नहीं।
शिकायतकर्ता ने जांच में कई बिंदुओं को शामिल करने की मांग की है। इनमें बोलीदाताओं के Technical Bid, Financial Bid, Eligibility Documents, GST, PAN, Drug Licence, पते, अधिकृत व्यक्तियों, आपसी व्यावसायिक संबंधों और अन्य दस्तावेजों का परीक्षण शामिल है।
इसके साथ ही यह भी जांचने की मांग की गई है कि L1, L2 और L3 का निर्धारण नियमानुसार हुआ या नहीं, सभी कंपनियों ने स्वतंत्र रूप से बोली लगाई या नहीं और कहीं किसी आपूर्तिकर्ता को अनुचित लाभ पहुंचाने की स्थिति तो नहीं बनी।
यही नहीं, शिकायत में टेंडर से संबंधित पूरी मूल फाइल को सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है, ताकि जांच के दौरान Comparative Statement, Technical एवं Financial Bid, निविदा समिति की कार्यवाही, Approval Notes और अन्य अभिलेख उपलब्ध रहें।
असली सवाल—सरकारी खजाने पर कितना पड़ा बोझ?
बिल, स्टॉक और भुगतान रिकॉर्ड का हो मिलान; दोष साबित हुआ तो वसूली और कार्रवाई की मांग
पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल संभावित वित्तीय नुकसान का है। राजकुमार यादव ने कहा है कि केवल टेंडर की दरों की तुलना करने से यह तय नहीं किया जा सकता कि सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ। इसके लिए वास्तविक खरीद और भुगतान का पूरा हिसाब खंगालना होगा।
उन्होंने मांग की है कि प्रत्येक दवा की स्वीकृत मात्रा, वास्तविक आपूर्ति, खरीद दर, बिल और भुगतान का मिलान किया जाए। इसके बाद तुलनात्मक सरकारी दर और रामगढ़ की खरीद दर के बीच अंतर को वास्तविक खरीद मात्रा से जोड़कर यह निकाला जाए कि सरकारी राशि पर कितना अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा।
इसके लिए Purchase Order/Work Order, Invoice/Bill, Stock Register, Goods Receipt, Quality Testing Report, Payment Voucher तथा भुगतान रिकॉर्ड की जांच एवं आपस में मिलान कराने की मांग की गई है।
साथ ही जांच पूरी होने तक संबंधित टेंडर की मूल फाइल और सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग की गई है।
राजकुमार यादव ने उपायुक्त से सिविल सर्जन कार्यालय से स्वतंत्र किसी सक्षम वरिष्ठ अधिकारी अथवा उपयुक्त जांच एजेंसी से विशेष वित्तीय ऑडिट एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
उन्होंने कहा कि यदि जांच में सरकारी धन का अनुचित उपयोग, नियमों का उल्लंघन, मिलीभगत, अनुचित लाभ अथवा अधिक दर पर खरीद के कारण वित्तीय नुकसान प्रमाणित होता है, तो दोषी पाए जाने वाले अधिकारी, कर्मचारी अथवा आपूर्तिकर्ता के खिलाफ नियमानुसार विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए तथा सरकारी राशि की वसूली सुनिश्चित होनी चाहिए।
राजकुमार यादव ने दोहराया कि शिकायत का उद्देश्य किसी व्यक्ति या कंपनी को बिना जांच दोषी ठहराना नहीं है। उनका कहना है कि उपलब्ध आंकड़ों में जब कुछ दवाइयों की दरों में 5, 10 और कुछ मामलों में 20 से 40 गुना तक का अंतर दिखाई दे रहा है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और वित्तीय ऑडिट जनहित में जरूरी है।
प्रशासनिक पुष्टि के बाद ही साफ होगी पूरी तस्वीर
गौरतलब है कि पूरी खबर झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव राजकुमार यादव की शिकायत और उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए तुलनात्मक आंकड़ों के आधार पर है। इसमें लगाए गए आरोपों और आंकड़ों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
प्रशासन द्वारा टेंडर रिकॉर्ड, खरीद प्रक्रिया, वास्तविक आपूर्ति, भुगतान और संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि दरों में अंतर के पीछे वास्तविक कारण क्या था और सरकारी खजाने पर वास्तव में कोई अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा या नहीं।
दैनिक स्टेट की ओर से संबंधित विभाग/प्रशासन का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

