विशेष खोजी रिपोर्ट | दैनिक स्टेट । धर्मेंद्र पटेल & चंदन
रामगढ़ से शुरू हुई थी राजा राममोहन राय की नई पहचान! क्या यहीं लिखी गई भारतीय पुनर्जागरण की पहली पटकथा?
भारत में सामाजिक क्रांति, सती प्रथा के उन्मूलन, ब्रह्म समाज और आधुनिक विचारों की बात होते ही सबसे पहला नाम राजा राममोहन राय का आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय पुनर्जागरण के इस महानायक की प्रशासनिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय झारखंड के रामगढ़ से जुड़ा है।
रामगढ़ की धरती पर मिला पहला बड़ा अवसर, यहीं बने शेरिस्तेदार और दीवान
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 1803 में मुर्शिदाबाद में नौकरी समाप्त होने के बाद राजा राममोहन राय रोजगार की तलाश में थे। इसी दौरान उनके पुराने मित्र और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जॉन (विलियम) डिग्बी ने उन्हें अपने निजी दीवान के रूप में नियुक्त किया। वर्ष 1805-1806 में तत्कालीन रामगढ़ कलेक्टरी, जिसमें आज का रामगढ़, हजारीबाग और चतरा शामिल थे, वहीं से राममोहन राय की नई प्रशासनिक यात्रा शुरू हुई। अगस्त से अक्टूबर 1806 तक उन्होंने रामगढ़ की फौजदारी अदालत में शेरिस्तेदार (रजिस्ट्रार) के रूप में कार्य किया। यह वही दौर था जब वे न्यायिक अभिलेख, सरकारी आदेश और राजस्व व्यवस्था को नजदीक से समझ रहे थे। आज भी इस कार्यकाल से जुड़े दस्तावेज इतिहास की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।
रामगढ़ ने बदली सोच, जॉन डिग्बी ने गढ़ा आधुनिक राममोहन राय
रामगढ़ में जॉन डिग्बी के साथ काम करना केवल एक नौकरी नहीं था, बल्कि राजा राममोहन राय के बौद्धिक विकास का महत्वपूर्ण चरण था। डिग्बी ने लिखा कि जब वे 1801 में राममोहन राय से मिले थे तब वे अंग्रेजी बोल तो लेते थे, लेकिन लिखने में दक्ष नहीं थे। 1805 के बाद आधिकारिक पत्राचार, यूरोपीय अधिकारियों से संवाद और अंग्रेजी दस्तावेजों के अध्ययन ने उनकी भाषा और सोच दोनों को बदल दिया। 1809 में गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो को लिखा गया उनका प्रसिद्ध पत्र भारतीयों द्वारा लिखे गए शुरुआती उत्कृष्ट अंग्रेजी पत्रों में माना जाता है। कई इतिहासकार मानते हैं कि रामगढ़ और डिग्बी के साथ बिताया गया समय ही आगे चलकर उनके तर्कवादी और सुधारवादी व्यक्तित्व की नींव बना।
रामगढ़ से रंगपुर और फिर कलकत्ता… यहीं से जन्म लिया भारतीय पुनर्जागरण ने
रामगढ़ के बाद राजा राममोहन राय जॉन डिग्बी के साथ जेसोर, भागलपुर और रंगपुर गए। 1814-15 में डिग्बी के भारत छोड़ने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और कलकत्ता में स्थायी रूप से बस गए।
इसके बाद घटनाएं तेजी से बदलीं—
- 1815 में आत्मीय सभा की स्थापना।
- वेदांत ग्रंथ और वेदांतसार का प्रकाशन।
- उपनिषदों का अनुवाद।
- सती प्रथा के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन।
- महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की आवाज।
- 1820 में द प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस का प्रकाशन।
- आगे चलकर ब्रह्म समाज की स्थापना और आधुनिक भारत के सामाजिक पुनर्जागरण की शुरुआत।
इतिहासकारों का मानना है कि यदि रामगढ़ और डिग्बी के साथ उनका प्रशासनिक अनुभव न होता, तो संभवतः उनके सुधारवादी आंदोलन का स्वरूप भी अलग होता।
खोज रहा है राजा राममोहन राय के हस्ताक्षर, क्या हजारीबाग ,रामगढ़ के अभिलेखागार में छिपा है इतिहास का सबसे बड़ा खजाना?
सूत्र बताते है कि हजारीबाग , रामगढ़ और चतरा में राजा राममोहन राय के कार्यकाल से जुड़े दस्तावेजों की खोज का अभियान शुरू किया है। यदि उनके हस्ताक्षर वाले रिकॉर्ड, न्यायालयीन आदेश, राजस्व दस्तावेज या अन्य अभिलेख उपलब्ध हों तो उन्हें संरक्षित कर संग्रहालय में रखा जाए, ताकि शोधार्थी और नई पीढ़ी इस इतिहास को जान सके।
यदि ये दस्तावेज मिलते हैं तो यह केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के इतिहास के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। इससे यह प्रमाण और मजबूत होगा कि भारतीय पुनर्जागरण के महानायक की वैचारिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय रामगढ़ की धरती पर लिखा गया था।
दैनिक स्टेट विशेष निष्कर्ष
राजा राममोहन राय को आज पूरी दुनिया सती प्रथा के विरोध, महिला अधिकारों, आधुनिक शिक्षा और भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत के रूप में जानती है। लेकिन उनके जीवन का वह अध्याय, जिसने उन्हें एक कुशल प्रशासक, तर्कशील चिंतक और आधुनिक विचारक बनाया, उसकी शुरुआत रामगढ़ से हुई थी। यही कारण है कि आज, दो सौ वर्ष बाद भी, रामगढ़ केवल एक जिला नहीं बल्कि भारतीय नवजागरण के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
तथ्य संबंधी टिप्पणी: उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में अधिकारी के नाम John Digby और William Digby के उल्लेख में कुछ भ्रम मिलता है। राजा राममोहन राय के साथ कार्य करने वाले ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी का व्यापक रूप से स्वीकार्य नाम John Digby माना जाता है। इसी प्रकार, उनके पदनाम (निजी दीवान, शेरिस्तेदार, अस्थायी दीवान) और सेवा अवधि के कुछ विवरण विभिन्न स्रोतों में थोड़ा भिन्न मिलते हैं, इसलिए उन्हें ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह रिपोर्ट विभिन्न ऐतिहासिक पुस्तकों, ब्रिटिशकालीन अभिलेखों, शोध प्रकाशनों, न्यायिक पत्राचार तथा उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों के अध्ययन पर आधारित एक खोजी ऐतिहासिक प्रस्तुति है। दैनिक स्टेट इस रिपोर्ट में वर्णित प्रत्येक ऐतिहासिक तथ्य या दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने का दावा नहीं करता। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में कुछ घटनाओं, पदनामों, तिथियों और व्यक्तियों के विवरण में भिन्नता मिल सकती है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य इतिहास के कम चर्चित पहलुओं को पाठकों के सामने प्रस्तुत करना और आगे के शोध को प्रोत्साहित करना है।

