खोजी रिपोर्ट: धर्मेंद्र पटेल । दैनिक स्टेट
क्या हर बड़े युद्ध से पहले खुलती रही डॉल्फिन टंगस्टन खदान? 1917 से 2026 तक का पूरा इतिहास, संयोग या रणनीतिक तैयारी?
1917: प्रथम विश्व युद्ध में पहली बार खुली डॉल्फिन खदान, 1920 में शांति आते ही बंद
1914 से 1918 तक चले प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हथियारों और उच्च गुणवत्ता वाले स्टील की भारी मांग पैदा हुई। इसी दौर में ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया स्थित किंग आइलैंड पर 1917 में डॉल्फिन टंगस्टन खदान का औद्योगिक उत्पादन शुरू हुआ। टंगस्टन का उपयोग गोला-बारूद, तोपों और विशेष मिश्रधातु बनाने में किया जाता था। लेकिन युद्ध समाप्त होने और टंगस्टन की कीमत गिरने के बाद 1920 में खदान बंद करनी पड़ी, क्योंकि इसका संचालन आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रहा।
1938: द्वितीय विश्व युद्ध की आहट और फिर खुली खदान, 1939-1945 के युद्ध में बना रणनीतिक हथियार
द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक चला, लेकिन उससे ठीक पहले 1938 में डॉल्फिन खदान को फिर सक्रिय किया गया। युद्ध के दौरान टंगस्टन की मांग तेजी से बढ़ी क्योंकि इसका इस्तेमाल टैंक, कवच, मशीनगन, बम, विमान इंजन और उच्च तापमान सहने वाले सैन्य उपकरणों में होने लगा। 1942 के बाद ओपन-कट खनन का विस्तार हुआ और आगे चलकर भूमिगत खनन भी शुरू हुआ। युद्ध खत्म होने के बाद भी शीत युद्ध के कारण यह खदान पूरी तरह बंद नहीं हुई, बल्कि उत्पादन जारी रहा।
कोरिया, वियतनाम और शीत युद्ध: 1950 से 1990 तक लगातार रणनीतिक महत्व
1950-53 के कोरियाई युद्ध, 1955-1975 के वियतनाम युद्ध और पूरे शीत युद्ध काल में पश्चिमी देशों को चीन और सोवियत प्रभाव से बाहर टंगस्टन की आपूर्ति चाहिए थी। इसी कारण डॉल्फिन परियोजना का विस्तार हुआ। 1969 में नए निवेश, 1973 में डॉल्फिन भूमिगत खदान, और 1974 में बोल्ड हेड परियोजना शुरू की गई। यह खदान पश्चिमी देशों के लिए चीन के बाहर टंगस्टन का बड़ा स्रोत बन गई। लेकिन 1980 के दशक के अंत में वैश्विक कीमतें गिरने लगीं और शीत युद्ध समाप्ति की ओर बढ़ा।
1990 में बंद… 2026 में फिर चालू: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है या दुनिया बदल रही है?
1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और शीत युद्ध समाप्त होने के बाद टंगस्टन की मांग और कीमतों में गिरावट आई। ऐसे में नवंबर 1990 में डॉल्फिन खदान बंद कर दी गई और बाद में इसकी सुरंगों में पानी भर गया। लगभग तीन दशक बाद 2026 में इसे फिर शुरू किया गया। इस बार दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के तनाव, चीन-अमेरिका तकनीकी प्रतिस्पर्धा और महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक होड़ के दौर से गुजर रही है। इसलिए सोशल मीडिया पर इसे “तीसरे विश्वयुद्ध का संकेत” कहा जा रहा है।
इतिहास का संयोग या भविष्य का संकेत? फिर चर्चा में आई डॉल्फिन टंगस्टन खदान
ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया स्थित किंग आइलैंड की डॉल्फिन टंगस्टन खदान करीब तीन दशक बाद 2026 में दोबारा चालू होने के साथ ही वैश्विक बहस का विषय बन गई है। इतिहास में यह खदान प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध तथा कोरिया और वियतनाम युद्ध के दौर में भी सक्रिय रही थी। यही कारण है कि इसके पुनः खुलने को कुछ लोग संभावित बड़े वैश्विक संघर्ष का संकेत मान रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह ऐतिहासिक संयोग है, इसे तीसरे विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि दुनिया की बड़ी ताकतें अब तेल के साथ-साथ क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर भी रणनीतिक तैयारी में जुट चुकी हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन की चुनौती ने बढ़ाई टंगस्टन की अहमियत
आज दुनिया एक साथ कई मोर्चों पर तनाव झेल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है, पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान और इजरायल से जुड़े तनाव समय-समय पर बढ़ते रहे हैं, जबकि चीन और पश्चिमी देशों के बीच तकनीकी एवं व्यापारिक प्रतिस्पर्धा भी तेज है। ऐसे माहौल में टंगस्टन जैसी धातु, जिसका उपयोग मिसाइल, टैंक, गोला-बारूद, लड़ाकू विमान, ड्रोन और रक्षा उपकरणों में होता है, अचानक रणनीतिक संपत्ति बन गई है। यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोपीय देश चीन पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक स्रोत विकसित कर रहे हैं। इसलिए डॉल्फिन खदान का खुलना केवल व्यावसायिक निर्णय नहीं बल्कि वैश्विक आपूर्ति सुरक्षा की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
युद्ध अब केवल सीमा पर नहीं, खनिजों और सप्लाई चेन पर भी लड़ा जा रहा है
आधुनिक दौर का संघर्ष केवल सैनिकों और हथियारों तक सीमित नहीं है। आर्थिक प्रतिबंध, सेमीकंडक्टर नियंत्रण, साइबर हमले, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति और तकनीकी प्रतिबंध भी अब वैश्विक शक्ति संतुलन तय कर रहे हैं। जिस तरह 20वीं सदी को तेल की राजनीति ने प्रभावित किया था, उसी तरह 21वीं सदी को क्रिटिकल मिनरल्स की भू-राजनीति प्रभावित कर सकती है। टंगस्टन, लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ जैसे खनिज अब किसी भी देश की सामरिक ताकत का हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए डॉल्फिन खदान का पुनर्जीवन बदलती विश्व व्यवस्था का प्रतीक माना जा रहा है, न कि केवल एक सामान्य खनन परियोजना।
ओभारत के लिए बड़ा संदेश: केवल हथियार नहीं, खनिज सुरक्षा भी बनेगी राष्ट्रीय शक्ति
डॉल्फिन टंगस्टन खदान का दोबारा खुलना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देता है। भारत ने हाल के वर्षों में राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल्स मिशन, विदेशों में खनिज परिसंपत्तियों में निवेश और लिथियम खोज जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा अभी काफी कठिन है। रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और हाई-टेक उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि डॉल्फिन खदान को सीधे तीसरे विश्वयुद्ध का संकेत कहना उचित नहीं होगा, लेकिन यह निश्चित रूप से उस नए युग की शुरुआत का प्रतीक है, जहां महाशक्तियों की असली लड़ाई संसाधनों, तकनीक और सप्लाई चेन पर नियंत्रण की होगी। यदि वैश्विक तनाव बढ़ता है तो इतिहासकार आने वाले वर्षों में 2020 के दशक को “क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक राजनीति का दशक” भी कह सकते हैं।
लेकिन तथ्य यह है कि ऐसा दावा सिद्ध नहीं हुआ है। खदान का पुनः खुलना तीसरे विश्वयुद्ध का प्रमाण नहीं है। इसे अधिक सही रूप में क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक प्रतिस्पर्धा, रक्षा आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा और सामरिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। इतिहास में युद्धों के दौरान इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है, लेकिन इससे भविष्य के युद्ध की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

