शहडोल: आज के बदलते दौर में अब लोग नौकरी की बजाय खुद का काम करना पसंद कर रहे हैं. ऐसे में कई लोगों के लिए मुर्गी पालन और मछली पालन जैसे व्यवसाय काफी फायदे का सौदा साबित हो रहे हैं. अगर आप मुर्गी पालन करना पसंद करते हैं, तो कलिंगा ब्राउन ये किस्म आपके लिए किसी एटीएम से कम नहीं है. क्योंकि मार्केट में इसके अंडे और मीट दोनों की गजब डिमांड है. मुर्गे की ये किस्म खटाखट पैसा दिलाती है.
कलिंगा ब्राउन मुर्गा नहीं ‘जैकपॉट’ है
कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर बीके प्रजापति बताते हैं कि, ”कलिंगा ब्राउन मुर्गे की किस्म बहुत खास है. क्योंकि इसे बैकयार्ड पोल्ट्री में पाला जा सकता है, और ये हमारे जनजातीय वर्ग के बीच में काफी प्रचलित भी है. क्योंकि ये डुएल परपज का होता है. इसका अंडा और मांस दोनों उपयोग में लाया जाता है. इसलिए भी लोग इसको पालन करना पसंद करते हैं. इसके अंडे और मांस से तगड़ी कमाई हो सकती है.
कितने दिन में तैयार हो जाता है मुर्गा
एक्सपर्ट बताते हैं कि, ये बहुत तेजी से बढ़ने वाले मुर्गे की किस्म है. ये 4 महीने लगभग 16 हफ्ते में ही अपना विकास कर लेता है. इतने समय में ही इस किस्म का मुर्गा एक से डेढ़ किलो तक वजन ग्रहण कर लेता है. ये मुर्गी की जो अन्य किस्में हैं उनसे 15 दिन पहले ही अंडे देना शुरू कर देता है और ये 175 दिन में ही अंडे देना शुरू कर देता है. 220 से 240 अंडे तक दे देता है.
बैकयार्ड पोल्ट्री में पालन संभव
इस किस्म के मुर्गे का पालन बैकयार्ड पोल्ट्री में ही संभव है. क्योंकि वहां से जो दाना पानी मिलता है उसी से अपना जीवन यापन कर लेता है. ये कलिंगा ब्राउन मुर्गा बैकयार्ड पोल्ट्री में जो किचन का वेस्ट होता है, या फिर सब्जियों का वेस्ट होता है उनको खाता है. उन्हीं से पेट भरकर तेजी से ग्रोथ करता है. उसके साथ ही इन्हीं चीजों से अपने जीवन यापन को पूर्ण कर लेता है.
इन किस्मों के क्रॉस से बना
कलिंगा ब्राउन मुर्गी के अंडे का वजन 50 से 60 ग्राम होता है. इसमें मुख्य रूप से कीट और बीमारियां बहुत कम लगती है. एक तरह से इस मुर्गे को चलते फिरते एटीएम की तरह माना जाता है. किसान इसका पालन करके बहुत कम समय में ग्रोथ कर अच्छी आय हासिल कर सकते हैं. कलिंगा ब्राउन मुर्गे की किस्म दो शानदार किस्मों का क्रॉस है. उड़ीसा के भुवनेश्वर में इसका क्रॉस कराया गया है, इसीलिए इसका नाम कलिंगा ब्राउन दिया गया है.”
क्षेत्र के कई लोग कर रहे पालन
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि, ”जहां तक बात है अपने क्षेत्र के किसानों की तो पहले भी अपने क्षेत्र में यह पाला जाता रहा है. उनसे चर्चा के दौरान यह पता चला है कि यह बहुत तेजी से ग्रोथ करने वाली किस्म है. इसलिए लोग इसे पालन करना पसंद कर रहे हैं, क्योंकि इससे अच्छी खासी कमाई भी हो रही है.”